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कंप्यूटर की पीढ़ियां || पूरी जानकारी || In Hindi

आज हम क्या पड़ेंगे ?


कंप्यूटर का इतिहास बहुत ही रोमांचकारी रहा है‌। प्रथम इलेक्ट्रॉनिक कम्प्यूटर का निर्माण 1946 में किया गया। इसके बाद वर्तमान समय के कम्प्यूटर तक जो भी सुधार हुए उनको चार भागों में बांटा गया है। जिसे कम्प्यूटर पीढ़ी (Computer Generation) कहा जाता है। 
कम्प्यूटर की पीढ़ी का वर्गीकरण कम्प्यूटर में लगे मुख्य पुर्जों, जिन्होंने कम्प्यूटर का स्वरूप ही बदल दिया, को आधार मानकर किया गया है। 

कम्प्यूटर में प्रयोग किए गये मुख्य इलेक्ट्रॉनिक पुर्जों के आधार पर कम्प्यूटर के विकास के चरणों को निम्नांकित पांच पीढ़ियों में बांटा गया है -



प्रथम पीढ़ी के कंप्यूटर (1st Generation Computers)


1946 में संयुक्त राज्य अमेरिका में पेन्सलवेनिया विश्वविद्यालय में विशालकाय 'इनिऑक' नाम का इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर स्थापित किया गया। 
इनिऑक (ENIAC) का पूरा नाम 'इलेक्ट्रानिक न्यूमेरिकल इंटीग्रेटर एण्ड केलकुलेटर' था। जिसे इलेक्ट्रानिक संख्यात्मक समकलित्र और परिकलित्र भी कहा जा सकता है। 
इस कम्प्यूटर को वैज्ञानिक एवं गणितज्ञ जे. पी. इंकर्ट और जॉन डब्लू. माचली की टीम ने तैयार किया था।

इस कम्प्यूटर में डायोड वॉल्व का प्रयोग किया गया था, जिससे अत्यधिक उष्मीय उत्सर्जन होता था एवं कम्प्यूटर शीघ्र ही गरम हो जाता था। पर यह कम्प्यूटर एक सेकण्ड में 5000 योग या 500 गुणा की क्रियाएं कर सकता था 100 इंजीनियरों का एक वर्ष का कार्य यह कम्प्यूटर केवल दो घंटे में कर सकता था। 33 मीटर लम्बी, 18000 इलेक्ट्रान नलिकाएं, 70000 प्रतिरोध और 10000 संधारित्र होते हुए भी इसमें स्मृति-भंडारण (Memory) की कोई व्यवस्था नहीं थी और यह दशमलव पद्धति (Decimal Number System) पर कार्य करता था।
UNIVAC

इसलिए वैज्ञानिक इसे कम्प्यूटर कम और कैलकुलेटर अधिक मानते थे। इसके कम्प्यूटर में अनेक सुधार किए गए जो द्विआधारी पद्धति (बाइनरी नम्बर सिस्टम) पर कार्य करते थे और MEMORY की भी व्यवस्था थी।

इनिऑक कम्प्यूटर की भी कुछ सीमाएं थीं। इनिऑक की 18000 इलेक्ट्रान नलिकाओं में से प्रतिदिन एक या दो नलिकाएं जल जाती थीं। इसलिए अगर और बड़े कम्प्यूटर बनाए जाते तो नलिकाओं के जलने की घटनाएं इतनी अधिक हो सकती थीं कि कम्प्यूटर द्वारा एक भी गणना करना सम्भव ना हो पाता। यह कम्प्यूटर बहुत अधिक बिजली खर्च करता था और अपने 150000 वाट शक्ति के उपकरणों से 50 घरेलू हीटरों के तुल्य गर्मी पैदा करता था।

इनिऑक के बाद सन् 1951 में 'यूनिवर्सल एकाउंट कम्पनी' के लिए इकर्ट-माउशली ने यूनिवेक (UNIVAC) नामक कम्प्यूटर बनाया। उसके बाद IBM 701 और IBM / 650 नामक कम्प्यूटर बनाए गए।



द्वितीय पीढ़ी के कंप्यूटर (2nd Generation Computers)


विलियम शॉकली  नाम के वैज्ञानिक एवं उनके दल ने सन् 1948 में संयुक्त राज्य अमेरिका की बेल (Bell) प्रयोगशाला में ट्रॉंजिस्टर नाम के इलैक्ट्रानिक पुर्जे का आविष्कार किया। इस सूक्ष्म परन्तु इलेक्ट्रान नलिकाओं की तुलना में कहीं अधिक सुचारू और कहीं अधिक टिकाऊ युक्ति ने अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों की भांति कम्प्यूटर के क्षेत्र में एकदम क्रांति ला दी। ट्रांजिस्टरों को बनाने के लिए अर्द्धचालक पदार्थों जैसे—सिलिकॉन, जर्मेनियम आदि का प्रयोग किया गया। यह पदार्थ ऊष्मा उत्सर्जित नहीं करते थे।
Transistors

द्वितीय पीढ़ी के कम्प्यूटर में वैक्यूम ट्यूब के स्थान पर ट्रांजिस्टर का प्रयोग किया गया। 
वैक्यूम ट्यूब कम्प्यूटर में सबसे ज्यादा ऊष्मा उत्सर्जित करती थी और इसके हटने से कम्प्यूटर आकार में बहुत छोटे हो गए और वह बहुत कम ऊष्मा उत्सर्जन करने लगे। कम ऊष्मा उत्सर्जन के कारण वातानुकूल संयंत्र की आवश्यकता भी कम हो गयी और ट्रॉंजिस्टर वाल्व से बहुत छोटा और वाल्व की अपेक्षा बहुत सस्ता भी था।

इस पीढ़ी के कम्प्यूटर को प्रयोग करना भी आसान था। इस कम्प्यूटर में बहुत सी आधुनिक सुविधाएं जैसे- स्मृति संग्रहण ( मेमोरी स्टोर), मैग्नेटिक टेप आदि उपयोग की जाने लगीं, इस कारण यह बहुत सुविधाजनक हो गया। मैग्नेटिक टेप पर लिखा गया डाटा मिटाया भी जा सकता था।

द्वितीय पीढ़ी के कम्प्यूटर निम्नलिखित थे— UNIVAC के 1108, RCA 501, IBM-700, 1401, 1620, 7094, C.D.C. 1604, 3600, लियोमार्क-III, एटलस और ICC-1901।



तृतीय पीढ़ी के कंप्यूटर ( 3rd Generation Computers)


Integrated Circuit  (IC)
इस पीढ़ी के कम्प्यूटर में ट्रांजिस्टर के स्थान पर इन्टीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuit IC) का प्रयोग किया गया। यह सैंकड़ों कंपोनेंट का कार्य स्वयं अकेले कर सकती थी।

अतः यह कम्प्यूटर द्वितीय जेनरेशन की तुलना में काफी छोटे आकार के बन गए और इन कम्प्यूटर का वजन भी पहले के
कम्प्यूटर की अपेक्षा कम हो गया। 

तकनीकी दृष्टि से इन कम्प्यूटर में बहुत सुधार आया। क्योंकि अब न तो बहुत से तारों के गुच्छे होते थे और न ही हजारों स्विच आदि कंपोनेंट। अतः इनकी मरम्मत बहुत आसान हो गई। इनको मेज पर रखकर भी प्रयोग किया जाने लगा। इस पीढ़ी के कम्प्यूटर में हाई लेवल लेंग्वेज जैसे―फोर्टान आदि का प्रयोग किया जाने लगा। इन कम्प्यूटर की कीमत पहले कम्प्यूटर की तुलना में बहुत कम हो गई।

इस पीढ़ी के कम्प्यूटर की मुख्य विशेषता यह थी कि इसे केवल एक ही व्यक्ति प्रयोग कर सकता था। इस विशेषता के कारण इस पीढ़ी के छोटे कम्प्यूटरों का प्रयोग व्यवसाय, शिक्षा, कार्यालयों आदि में किया जाने लगा।

इस पीढ़ी के मुख्य कम्प्यूटर थे-I.C.L.-2903, C.P.C. 1700. P.D.P.-11/45।




चतुर्थ पीढ़ी के कंप्यूटर (4th Generation Computers)


सम्पूर्ण विश्व में इस समय तक कम्प्यूटर को और अधिक छोटा एवं उपयोगी बनाने की होड़ मच गई, और इस प्रकार सन् 1974 में कम्प्यूटर का सर्वाधिक विकास हुआ।

 इस समय जो कम्प्यूटर बनाए गए, उनमें इन्टीग्रेटेड सर्किट ( Integrated Circuit-IC) के स्थान पर और अधिक कंपोनेंट्स की क्षमता रखने वाले माइक्रोप्रोसेसर (Microprocessor) का प्रयोग किया गया। 

एक माइक्रोप्रोसेसर (Microprocessor) अनेक इन्टीग्रेटेड सर्किट (Integrated Circuit - IC) का कार्य अकेले ही कर सकता था। 

इस कारण कम्प्यूटर का आकार और भी छोटा और उनकी ऊष्मा उत्सर्जन की क्षमता नगण्य हो गयी थी। यह माइक्रोप्रोसेसर गणना, स्मृति भंडार और तार्किक कार्य भी कर सकता था। इस पीढ़ी के कम्प्यूटर गणना के अतिरिक्त अनेक कार्य जैसे— हिन्दी, अंग्रेजी आदि भाषा में मुद्रित करना, चित्र बनाना, ध्वनि तैयार करना आदि भी कर सकते थे। 

यह कम्प्यूटर बहुत ही विश्वसनीय एवं कई दिन तक लगातार चलाते रहने पर भी खराब नहीं होते। इन कम्प्यूटर की भंडारण क्षमता बहुत अधिक होती है एवं इन कम्प्यूटर की भंडारण क्षमता अधिक और कम भी कराई जा सकती है। 

इस पीढ़ी के कम्प्यूटर हैं- COMMADOR-PET, D.C.M. TANDY, Z. X. SPECTRUM, IBM-PC आदि।




पंचम पीढ़ी के कंप्यूटर (5th Generation Computers)


आज विश्व में, कम्प्यूटर को और विकसित करने के प्रयास जारी हैं। अब तक के कम्प्यूटर सोच-समझकर निर्णय लेने में असमर्थ हैं। वे सिर्फ प्रयोग किए जा रहे प्रोग्राम के अनुसार कार्य करते हैं। 

आज के वैज्ञानिक कृत्रिम बुद्धि के प्रयोग द्वारा कम्प्यूटर को सोचने-समझने की क्षमता प्रदान करना चाहते हैं। जिससे कम्प्यूटर कृत्रिम बुद्धि रखने के कारण सभी कार्यों को स्वयं ही कम समय में सम्पन्न कर सकें। चूंकि प्रत्येक एनालॉग संकेत को डिजिटल में नहीं बदला जा सकता, अतः अब वैज्ञानिक ऐसे कम्प्यूटर्स का विकास करने में जुटे हुए हैं जो एनालॉग संकेतों को इसी रूप में समझ कर उसके अनुरूप कार्य कर सके। पांचवीं जनरेशन के कम्प्यूटर्स में सोचने की शक्ति भी होगी। इन कम्प्यूटर्स की रचना समानान्तर डिजाइन की होगी और ये दिये गये निर्देशों के अनुसार प्राप्त जानकारी को विश्लेषित एवं उसका आदान-प्रदान भी कर सकेंगे।

जापान के वैज्ञानिकों ने कम्प्यूटर्स के विकास की इस योजना को किप्स (Knowledge Information Processing System) नाम दिया है। यह माना गया है कि इन कम्प्यूटर्स में दस अरब तार्किक अनुमितियां प्रति सेकण्ड (Logic Inference Per Second-LIPS) की क्षमता होनी चाहिये। इसके लिये उन्होंने 50 पैसे के सिक्के के बराबर चिप बना ली है, जिसमें 40 लाख पुस्तकों के बराबर जानकारी संग्रहीत की जा सके।



भविष्य के कंप्यूटर (Computers of Future)


अब तक की पांचों पीढ़ियों के कम्प्यूटर्स इलेक्ट्रॉन (Electron) के प्रवाह (Flow) पर आधारित हैं, जबकि आने वाले समय में ये फोटॉन (Photon) पर आधारित होंगे। फोटॉन (Photon) प्रकाश का मूल कण होता है, जबकि इलेक्ट्रॉन (Electron) पदार्थ के तीन मूल कणों में से एक होता है। प्रकाश की गति सबसे अधिक मानी गयी है, अतः फोटॉन (Photon) पर आधारित कम्प्यूटर्स की कार्य गति अत्यन्त तीव्र हो जाएगी। जिस प्रकार आज के कम्प्यूटर्स को डिजिटल कम्प्यूटर्स (Digital Computers) कहा जाता है, उसी प्रकार आने वाले समय में फोटॉन पर आधारित कम्प्यूटर्स को फोटॉनिक (Photonic) अथवा ऑप्टिकल (Optical) कम्प्यूटर्स कहा जायेगा। ये कम्प्यूटर्स अब तक के कम्प्यूटर्स से कहीं अधिक शक्तिशाली एवं आकार में सूक्ष्म होंगे। 

फोटॉनिक कम्प्यूटर्स (Photonic Computers) के बाद कम्प्यूटर वैज्ञानिक बायोलॉजिकल कम्प्यूटर्स (Biological Computers) के बारे में भी विचार कर रहे हैं।




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