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नमस्कार दोस्तों, स्वागत है आप सबका मेरे इस नए ब्लॉग में। मैं अपने इस ब्लॉग की मदद से बिना टाइम वेस्ट किए आप सब को एक आसान भाषा में यह समझाने की कोशिश करूंगा कि कंप्यूटर का इतिहास कितना पुराना है? और कंप्यूटर बनाने का आईडिया कैसे आया?
कंप्यूटर का इतिहास (History of Computer)
कंप्यूटर का इतिहास बहुत पुराना है। इसकी प्रारंभिक शुरुआत तब हुई, जब मनुष्य ने गिनने के लिए उंगलियों का प्रयोग किया। परंतु उंगलियों पर गिनतीयां बहुत कम मात्रा में की जा सकती हैं।
इसके बाद शिकारियों को यह जानने की इच्छा रहती थी कि उन्होंने कितने जानवरों, पक्षियों आदि का शिकार किया। इसके लिए मनुष्य ने मिट्टी की दीवार पर पशु पक्षियों के चित्र बनाने शुरू किए।
इसके बाद 650 बी. सी. में इजिप्ट के निवासियों (Egyptians) ने पशु पक्षियों की आकृतियों को एक विशेष प्रकार के चिन्हों द्वारा गुफाओं में बनाया। यह लोग इन चिन्हों को एक विशेष विधि द्वारा गिनने के काम लाते थे। इसके बाद मनुष्य ने गिनने के लिए अनेक व्यक्तियों को खोजा। लेकिन कोई भी युक्ति मनुष्य के लिए कारगर सिद्ध नहीं हुई।
इसके बाद सबसे आधुनिक गणनात्मक युक्ति अबाकस (Abacus) का आविष्कार सोलहवीं शताब्दी में चीन में हुआ। यह लकड़ी का एक आयताकार फ्रेम होता है। इस फ्रेम को दो भागों में बांटा गया। अबाकस का पहला भाग छोटा तथा दूसरा भाग बड़ा रखा गया। इस फ्रेम में बाईं और के सिरे से दाहिनी ओर के सिरे तक मध्य छड़ को पार करते हुए तार लगे रहते हैं, इन तारों में मोती पिरोए जाते थे। इस अबाकस ने गणित विशेषज्ञों को नई दिशा प्रदान की और इसका प्रयोग चीन के साथ-साथ जापान, रूस आदि देशों में होने लगा। इन देशों में अपनी सुविधानुसार अबाकस के ढांचे में कुछ परिवर्तन किए।
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| Abacus |
अब हमें जो संख्या लिखनी है, उस क्रम का मोती खिसकाकर मध्य छड़ के पास ले आते थे। ऊपर से नीचे की ओर प्रत्येक पंक्ति क्रमवार इकाई, दहाई, सैंकड़ा, हजार, दस हजार, लाख प्रदर्शित करती है।
यदि हमें अबाकस पर 761891 (सात लाख इकसठ हजार आठ सौ इक्यानवे) प्रदर्शित करना हो तो हम लाख वाली पंक्ति में बायीं ओर से एक मोती जिसका मान पाँच एवं दाहिनी ओर से दो मोती जिसमें प्रत्येक का मान एक-एक होता है, उन्हें मध्य छड़ की ओर खिसका देंगे। इस प्रकार हमारे अबाकस पर सात लाख प्रदर्शित होगा। अब दस हजार वाली पंक्ति में छः लिखने के लिए बायीं ओर से एक मोती और दाहिनी ओर से भी एक मोती मध्य छड़ के पास लायेंगे। अब हजार वाली पंक्ति में एक लिखने लिए सिर्फ दाहिनी ओर से एक मोती मध्य छड़ की ओर खिसकायेंगे। क्योंकि दाहिनी ओर के प्रत्येक मोती का मान एक होता है। इस प्रकार हमारे अबाकस पर 761000 प्रदर्शित होगा। अब हम अबाकस पर सैंकड़े वाली पंक्ति में आठ लिखने के लिए बायीं ओर से एक मोती एवं दाहिनी ओर से तीन मोती मध्य छड़ के पास लायेंगे क्योंकि बायीं ओर के एक मोती का मान पाँच और दाहिनी ओर के प्रत्येक मोती का मान एक है। इस प्रकार सैंकड़े वाली पंक्ति में मध्य छड़ के पास आये मोतियों का मान आठ हो जाएगा। इस प्रकार हमारे अबाकस पर 761800 प्रदर्शित होगा। अब हमें दहाई वाली पंक्ति में नौ लिखने के लिए बायीं ओर से एक मोती एवं दाहिनी ओर से चार मोती मध्य छड़ के पास लाने होंगे। क्योंकि पाँच और चार का योग नौ होता है। इस प्रकार हमारे अबाकस पर 761890 प्रदर्शित होगा। अब इकाई वाली पंक्ति में एक लिखने के लिए हम दाहिनी ओर से एक मोती मध्य छड़ के पास लायेंगे। इस प्रकार हमारे अबाकस पर 761891 प्रदर्शित होगा।
अब हमें जो संख्या जोड़नी है, उस संख्या के बराबर मोती मध्य छड़ से पास लायेंगे। यदि हमें अबाकस पर प्रदर्शित संख्या में से कोई संख्या घटानी है तो हम उस संख्या के बराबर मोती मध्य छड़ के पास हटा देंगे। इस प्रकार अबाकस पर जो संख्या प्रदर्शित होती है वही संख्या हमारी गणना का परिणाम होगा।
चीन में अबाकस का आज भी प्रयोग किया जाता है। बहुत से विद्यार्थी Calculator की अपेक्षा अबाकस द्वारा गणना करना सरल मानते हैं और प्रतियोगिताओं में अबाकस द्वारा गणना तेज गति से कर परिणाम शीघ्र प्राप्त किए जाते रहे हैं। जापान में जो अबाकस बनाया गया, वह चीनी अबाकस का ही एक अलग रूप है। इस अबाकस में मध्य छड़ के बाईं ओर एक मोती होता था और शेष सभी पाँच मोती मध्य छड़ के दाहिनी ओर होते थे । इस अबाकस में बाईं ओर के मोती का मान पाँच एवं दाहिनी ओर के शेष सभी पाँच मोतियों का मान एक-एक होता था। इस अबाकस की गणना विधि बिल्कुल चीनी अबाकस के समान थी ।
कुछ समय बाद रूसी अबाकस का निर्माण हुआ। यह अबाकस चीनी और जापानी अबाकस से थोड़ा भिन्न था। इस अबाकस के आयताकार फ्रेम में मध्य छड़ नहीं थी और प्रत्येक पंक्ति में दस-दस मोती होते थे । प्रत्येक मोती का मान एक-एक होता था। इसे फ्रेम के किसी भी ओर विस्थापित करके प्रयोग किया जा सकता था ।
सन् 1617 में स्कॉट के गणितज्ञ सर जॉन नेपियर ने एक युक्ति का आविष्कार किया, जिसे नेपियर बोन के नाम से जाना जाता था।
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| Sir John Nepier |
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| Speedometer |
इसमें दी गई संख्याओं से सम्बन्धित छड़ों को पास-पास रखकर गणितीय संक्रियाएं की जाती थीं। इस युक्ति द्वारा जोड़, घटा, गुणा, भाग बड़ी सरलता से किया जा सकता था। इस युक्ति ने Analogue कम्प्यूटर तैयार करने में सहायता प्रदान की। इस युक्ति के कुछ समय पश्चात् ओडोमीटर की खोज की गयी; जिसे अब स्पीडोमीटर के नाम से जाना जाता है। इस यन्त्र का प्रयोग आज भी विभिन्न स्थानों व कार्यों के लिए किया जाता है।
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| Slide Rule |
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| Pascaline |
सन् 1642 में प्रथम यांत्रिक गणना युक्ति का आविष्कार फ्रांस के गणितज्ञ और मनोवैज्ञानिक ब्लेज पास्कल (Blaise Pascal) द्वारा किया गया। ब्लेज पास्कल के पिता रायन के कर अधीक्षक के पद पर कार्यरत थे और उन्हें अत्यधि काम करना पड़ता था। गणना की गति कम होने के कारण वह रात देर तक कार्य करते रहते थे। जब ब्लेज पास्कल 18 वर्ष की आयु का था तो उसने अपने पिता के कार्य में सहायता पहुंचाने का निश्चय किया और वह यांत्रिक गणना युक्ति की खोज में जुट गया। दो वर्षों के अथक प्रयासों के पश्चात् एक यांत्रिक गणना युक्ति का आविष्कार हुआ । इस यांत्रिक गणन युक्ति को नाम दिया गया दिया गया पास्केलाइन (Pascaline)।
पास्केलाइन (Pascaline) पीतल से निर्मित एक आयताकार बक्सा था जो आठ अंकों तक के जोड़ का अभिकलन कर के लिए आठ घूमने योग्य डायल्स (8 Movable Dials) का प्रयोग करता था। इसके लिए यह डिवाइस (Device) दस के आधार (Base) का प्रयोग करता था।
जब एक पहिया एक पूरा चक्कर घूम जाता था तब दूसरा पहिया एक स्थान खिसक जाता था। अर्थात् इकाई के चक्के के दस बार घूमने पर 'दहाई का चक्का' एक बार घूमता और दहाई के चक्के के दस बार घूमने पर सैंकड़े का चक्का एक बार घूमता। यही सम्बन्ध सैंकड़े के और हजार के चक्कों में, हजार और दस हजार के चक्कों में, दस हजार के और एक लाख के चक्कों में तथा उसके आगे के चक्कों में था। पास्कलाइन (Pascaline) का सबसे बड़ा दोष यह था कि यह केवल जोड़ की क्रिया ही कर सकता था।
बाद में जर्मन वैज्ञानिक गाट फ्रीड विलहल्म लाइबनित्स ने पास्कल के यन्त्र में संशोधन किए। उन्होंने चक्कों के स्थान पर दतिदार गरारियों का उपयोग किया। साथ ही उसमें ऐसे संशोधन भी किए जिनके फलस्वरूप उससे गुणा और भाग की क्रियाएं अधिक आसानी से की जा सकें। लाइबनित्स द्विआधारी पद्धति (Binary Number System) में भी कुछ रुचि रखते थे। विशेषज्ञों का मानना था कि यदि वे बाइनरी नम्बर सिस्टम में समुचित रुचि लेते तो शायद कम्प्यूटर का आविष्कार काफी पहले हो जाता।
जर्मन गणितज्ञ कुम्मेर ने 1847 में एक ऐसी मशीन विकसित की जो कितनी भी संख्याओं को, किसी भी क्रम में जोड़
अथवा घटा सकती थी यह मशीने बहुत बड़े पैमाने पर बनाई एवं बेची गयीं जो बहुत ही लोकप्रिय हो गई।
ब्रिटिश आविष्कारक और गणितज्ञ चार्ल्स बैबेज (1791-1871) ने पहली बार सम्पूर्ण कम्प्यूटर की कल्पना की। चार्ल्स का जन्म एक सम्पन्न परिवार में हुआ। उनके जीवन का उद्देश्य एक आदर्श परिकलन यन्त्र का आविष्कार करना था। इस उद्देश्य के लिए उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन और धन अर्पण कर दिया।
आखिरकार सन् 1821 में वे एक ऐसी मशीन का कार्यकारी मॉडल तैयार करने में सफल हो गए जो बीजगणितीय समीकरणों और गणित तालिकाओं का दशमलव के तीसरे स्थान तक सही मान निकाल सकती थी। इस मशीन का नाम गणितज्ञ चार्ल्स बावेज ने 'डिफ्रेंस मशीन' रखा। इस आविष्कार के बदले 'रायल एस्ट्रानामिकल सोसायटी' ने उन्हें पदक प्रदान किया। बाद में बावेज ने अपनी डिफेंस मशीन का एक ऐसा मॉडल तैयार करने की योजना बनाई जो न केवल बहुत बड़ा और शक्तिशाली हो, वरन् जो दशमलव के बीसवें स्थान तक सही-सही परिणाम भी दे सके। शीघ्र ही उन्होंने एक 'विश्लेषक इंजन' अर्थात् एनालिटिकल इंजन (Analytical Engine) का ब्लू प्रिंट तैयार कर लिया। उस ब्लू प्रिंट में आधुनिक कम्प्यूटर के सब गुण मौजूद थे। उसमें निवेश (Input), 'प्रक्रिया यूनिट' (जहां सब गणितीय क्रियाएं कार्यान्वित हो सकें), 'नियन्त्रण यूनिट', 'स्मृति' (Memory) और 'निर्गम' (Output) की व्यवस्था थी उनका विचार एक ऐसा कम्प्यूटर तैयार करने का था जो पूर्वनिश्चित कार्यक्रम के अनुसार कार्य कर सके। पर उस समय तक बावेज दिवालिया हो चुके थे। उन्होंने डिफेंस मशीन बनाने में ही अपना सब कुछ लुटा दिया था। कोई भी उन्हें आर्थिक सहायता देने के लिए तैयार नहीं था धन एकत्रित करने के लिए उन्होंने घोड़ों पर दांव आजमाए। पर अंत में जब 1871 में उनकी मृत्यु हुई, तब उनके इर्द-गिर्द रेखाचित्र, डिजाइन और अधूरे सपने भर ही थे। इस अद्वितीय योगदान के लिए चार्ल्स बैबेज को वैज्ञानिकों ने कंप्यूटर के गॉड फादर की उपाधि प्रदान की।
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| Punched Card |
जोसफ जैकर्ड (1752-1834) फ्रांस के निवासी और बुनाई विशेषज्ञ थे। उन्होंने छिद्रित कार्डों (Punched Cards) का आविष्कार किया था। इन कार्डों में विभिन्न प्रकार के पैटर्न डाले जा सकते थे। बाद में अमेरिका के निवासी हरमैन हालरिथ (1860-1929) ने इन छिद्रित कार्डों (Punched Cards) का उपयोग जनगणना प्रश्नावलियों को हल करने में किया । संयुक्त राज्य अमेरिका में 1880 में हुई जनगणना के बाद उन्होंने एक ऐसी मशीन विकसित की, जो जनगणना के आंकड़ों को छिद्रित कार्डों (Punched Cards) में भंडारित और वर्गीकृत कर सकती थी। पहले प्रत्येक महत्वपूर्ण जानकारी को एक कार्ड पर, जो आकार में अमेरिकी डालर के नोट के बराबर था, एक सरल कूट की मदद से, छिद्रित कर लिया गया। फिर वांछित सूचना प्राप्त करने के लिए छिद्रित कार्डों को यान्त्रिक तथा विद्युत युक्तियों की मदद से, एक पूर्वनिश्चित विधि के अनुसार, छांटा गया।
हालरिथ की मशीन और छिद्रित कार्डों (Punched Cards) की सहायता से 1890 की जनगणना के बाद विश्लेषण का कार्य मात्र छह सप्ताह में ही पूरा कर लिया गया।
जब चार्ल्स बावेज अपनी डिफ्रेंस मशीन विकसित कर रहे थे, उसी समय एक अन्य ब्रिटिश वैज्ञानिक, लार्ड कैल्विन, 'एनालॉग कम्प्यटर' का विकास कर रहे थे।
हालांकि प्रथम एनालॉग कम्प्यूटर 1876 में ही बना लिया गया था, पर इसका व्यावसायिक निर्माण 1936 में आरम्भ हुआ। बीसवीं सदी तक इलेक्ट्रान नलिकाओं का आविष्कार हो चुका था । और 1930 में ब्रिटिश प्राध्यापक एलट ट्यूरिंग ने पहली बार इलेक्ट्रानिक परिकलन यन्त्र की रूपरेखा बनाई, क्योंकि अब तक सब यांत्रिक युक्तियां थीं जो चक्रों, गरारियों का विलक्षण संयोजन मात्र थीं। बीसवीं सदी के तीसरे और चौथे दशकों में विभिन्न देशों-जर्मनी, ब्रिटेन, संयुक्त राज्य अमेरिका, रूस आदि में विभिन्न प्रकार के कम्प्यूटर बनाने की मानो होड़ सी लग गई। इन दशकों में कम्प्यूटर प्रौद्योगिकी में असामान्य रूप से प्रगति हुई। जर्मन इंजीनियर कोनराड ज्यूस ने 1934 में ही स्वचालित कम्प्यूटर बनाने के प्रयत्न आरंभ कर दिये थे। शीघ्र ही उसने 'जैड-प्रथम' नाम से एक ऐसा यांत्रिक कम्प्यूटर बना लिया जिसमें ऐसे 'की-बोर्ड' की व्यवस्था थी जो द्विआधारी पद्धति (Binary Number System) का उपयोग करता था।
द्वितीय विश्वयुद्ध में कोनराड ज्यूस ने हिटलर को युद्ध कार्यों में कम्प्यूटर इस्तेमाल करने की सलाह भी दी थी, परन्तु में हिटलर ने उस पर गौर नहीं किया और न ही ज्यूस को आर्थिक सहायता प्रदान की। कुछ लोगों का अनुमान है कि यदि हिटलर ने इस बात पर विचार किया होता तो कदाचित द्वितीय विश्वयुद्ध का परिणाम कुछ और ही हुआ होता। क्योंकि इस बीच इंग्लैंड में ऐसे कम्प्यूटर बना लिए गए थे जो जर्मन सेनाओं के कोड भाषा में दिए गए आदेशों को पढ़ सकते थे।
सन् 1930 में अमेरिकी कम्पनी 'इन्टरनेशनल बिजनेस मशीन' ने हारवर्ड विश्वविद्यालय के दो वैज्ञानिक हारवर्ड आइकेन्स और ग्रेस हापर से एक इलैक्ट्रानिक कम्प्यूटर विकसित करने का अनुरोध किया और इन दोनों वैज्ञानिकों के परिश्रमस्वरूप 1948 में 'आटोमेटिक सीक्वेंस कंट्रोल्ड केलकुलेटर' विकसित हुआ । उसे 'मार्क-प्रथम' नाम दिया गया। वास्तव में यह प्रथम इलेक्ट्रानिक कम्प्यूटर था। अठारह मीटर लम्बे और तीन मीटर ऊँचे इस विशालकाय 'मार्क-प्रथम' में 800 किलोमीटर लम्बे तार थे, हजारों विद्युत चुम्बकीय रिले थी, सैंकड़ों इलेक्ट्रान नलिकाएं थीं तथा हजारों की संख्या में अन्य घटक थे । यह केलकुलेटर 23 अंकों वाली दो संख्याओं का जोड़ लगभग पाँच सेकण्ड में कर सकता था। यही वह समय था जब प्रथम कम्प्यूटर को इलेक्ट्रानिक रूप प्रदान किया गया। इसके बाद कम्प्यूटर में अनेक सुधार किए गए।
प्रथम आधुनिक डिजिटल कम्प्यूटर (Digital Computer) को सन् 1939 ई० से 1942 ई० के बीच एम्स (Ames) में आईओवा के स्टेट यूनिवर्सिटी कैम्पस (Iowa State University Campus) में निर्मित किया गया था-जिसे ABC कहा गया, जो Atanasoff-Berry Computer का संक्षिप्त रूप है। ABC कम्प्यूटर को जिस टीम ने विकसित किया था, उसका नेतृत्व जॉन एटैनसॉफ (John Atansoff) एवं क्लिफॉर्ड बेरी (Clifford Berry) ने किया था। जॉन एटैनसॉफ (John Atansoff) भौतिकी-शास्त्र एवं गणित के प्रोफेसर थे तथा क्लिफॉर्ड बेरी (Clifford Berry) स्नातक की छात्रा थी। यह मशीन बाइनरी अर्थमेटिक (Binary arithmetiदी।, पैरलल प्रोसेसिंग (Parallel Processing), रिजेनरेटिव मेमोरी (Regenerative Memory), पृथक मेमोरी जैसे कॉन्सेप्ट्स (Concepts) का प्रयोग करता था, जिनका प्रयोग आज के कम्प्यूटरों में भी किया जाता है।
ABC मशीन के लिए विकसित की गई टेक्नोलॉजी को एटैनसॉफ (Atansoff) ने डब्लू. मौचली (W. Mauchly) को सौंप दिया जिन्होंने जॉन प्रेसपर इकर्ट (John Presper Eckert) के साथ मिलकर ENIAC (Electronic Numerical Integrator and Computer) नामक प्रथम लार्ज-स्केल डिजिटल कम्प्यूटर (First Large-Scale Digital Computer) विकसित किया। इसे पेनसिल्वानिया (Pennsylvania) के इलेक्ट्रिकल इन्जीनियरिंग (Electrical Engineering) के मूर स्कूल (Moore School) में किया गया था। ENIAC को यू.एस. आर्मी एवं नेवी (U.S. Army and Navy) के लिए फायरिंग एवं बॉम्बिंग टेबल्स (firing and bombing tables) को तैयार करने के लिए डिजाइन किया गया था। यद्यपि ENIAC को प्रोग्राम करना एक कठिन कार्य था, फिर भी यह सन् 1949 ई० से लेकर 1952 तक वैज्ञानिकी समस्याओं को हल करने के लिए एक प्रमुख साधन बना रहा। डाटा को प्रोसेस करने के लिए ENIAC छोटे प्रकाश बल्ब के साइज के 18,000 वैक्यूम ट्यूब्स (Vaccum Tubes) का प्रयोग करता था। ये ट्यूब्स (Tubes) ये आसानी से जलते थे तथा इन्हें निरन्तर रिप्लेस (Replace) करने की आवश्यकता होती थी ।
सन् 1945 ई० में वॉन न्यूमैन (Von Neumann) ने स्टोर्ड प्रोग्राम (Stored Program) एवं डाटा दोनों को स्टोर करने के लिए एक मेमोरी (Memory) युक्त इलेक्ट्रॉनिक डिस्क्रीट वैरिएबल ऑटोमेटिक कम्प्यूटर (Electronic Discrete Variable Automatic Computer) डिजाइन किया। कन्डीशनल कन्ट्रोल ट्रान्सफर (Conditional Control Transfer) के साथ स्टोर्ड मेमोरी टेकनीक (Stored Technique Memory) ने कम्प्यूटर को किसी भी समय स्टॉप (Stop) कर रिज्यूम (Resume) करने की सुविधा दी। इन दोनों ने एक साथ मिलकर कम्प्यूटर की प्रोग्रामिंग में बड़ी बहुआयामिता प्रदान की। वॉन न्यूमैन आर्किटेक्चर (Von Neumann) Architecture) का प्रमुख तत्व (Element) सेन्ट्रल प्रोसेसिंग यूनिट (Central Processing Unit-CPU) था, जिसने एकमात्र स्रोत (Source) के माध्यम से कम्प्यूटर के सभी कार्यों को समन्वित (Coordinate) करने की सुविधा दी।







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